सुख सुविधा के साथ संस्कार भी जरूरी है

सुख सुविधा के साथ संस्कार भी जरूरी है

Ramswaroop Rawatsare
रामस्वरूप रावतसरे लेखक

हर्षि कपिल हमेशा गंगा स्नान के लिये जाते थे। रास्ते में एक गांव आता था और वे इस गांव में एक वृद्धा के घर के पास से जाते आते थे । वृद्धा विधवा ब्राह्मणी या तो चरखा कातते मिलती या ध्यान करते । घर की हालत ठीक नहीं थी, वृद्धा कठोर परिश्रम करके घर चलाती थी। महर्षि कपिल को उसकी दशा देखकर दया आती ।

एक दिन दयावश महर्षि उसके धर पहुचे ओर बोले ’’बहन ! मैं यहां के आश्रम का कुलपति हॅू। मेरे कई शिष्य राज परिवार में है। तुम चाहों तो तुम्हारे लिये किसी स्थाई आजीविका की व्यवस्था करवा दूं। तुम्हारी यह असहाय अवस्था वास्तव में दुःखद हैं’’। ब्राह्मणी ने महर्षि कपिल का आभार व्यक्त किया और बोली ’’ देव! आपका हार्दिक धन्यवाद, पर आपने मुझे पहचानने में भूल की। मैं असहाय नहीं हॅू। मेरे पास पांच ऐसे रत्न है, जिनसे चाहूं तो मैं राजाओं जैसा वैभव प्राप्त कर सकती हॅू।’’ महर्षि कपिल ने आश्चर्य से पूछा-बहन कहां है वे पांच रत्न? क्या मैं देख सकता हॅू।’’

ब्राह्मणी ने महर्षि कपिल को आसन पर बैठाया। थौडी देर बाद पांच सुन्दर ,स्वस्थ , विनम्र बच्चे घर में आये। उन्होने मां को प्रणाम किया तथा कुलपति महर्षि कपिल को देख कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। सादगी भरे वस्त्रों में भी वे राजकुमारों से कम नहीं लग रहे थे। गुरूकुल से लोटे उन बालकों के गुण पारखी महर्षि कपिल ने बिना बताये ही जान लिए। उन्होंने ब्राह्मणी को प्रणाम कर कहा – ’’भद्रे ! सचमुच तुम्हारे पांच रत्न बडे बहुमुल्य हैं।ऐसे अनुषासित संस्कारवान बच्चे जिस घर में, देश में हों, वहां किसी प्रकार का अभाव रह ही नहीं सकता।’’

यह एक मां की कर्मठता का परिचय था। जो उसने साधन सुविधाओं को ठोकर मार कर अपने तथा अपने बच्चों के जीवन में अनुषासित होने तथा रहने का संदेश महर्षि कपिल को दिया था। आज कितनी माताऐं है जो ऐसा सोचती है। जहां यह सोचा जाता है, वहां बच्चे अनुशासित और संस्कारवान होते है। ऐसे बच्चे अपने माता पिता का ही नहीं देश का भी नाम रोशन करते है ।

लेकिन आज माता पिता खुद सुख सुविधा के लिये किसी भी स्तर तक जाने के लिये तैयार रहते है। ऐसे में उनके बच्चे वही करते है जो उन्होंने अपने माता पिता से सीखा है। ऐसा भी नहीं है कि सुख सुविधा प्राप्त बच्चा संस्कारवान या अनुशासित नहीं होता, होता है लेकिन यहां भी माता पिता की अनुशासित सोच और कर्मठता उसका मार्ग दर्शन करती हैं । हमें चाहिये कि हम बच्चों के सामने इस प्रकार का उदाहरण पेश करें जो उनके लिये ही नहीं समाज व देश के लिये भी अनुकरणीय हो। यह तभी संम्भव है जब हम अपने आप को उस कसोटी पर रखेंगे।

आज जो समाज में हलात बने है। वे अत्यधिक चिन्ताजनक है। हर तरफ आवारगी , निकम्मापन और समाज व राष्ट्र विरोधी कार्य हो रहे है। सभ्य कहलाने वाले समाज में इस प्रकार असभ्यता को स्थान कहां से प्राप्त हो गया। क्यों हम अपनों के साथ ही हैवानियत पर उतर आये है। हमारी सोच अपनी सुख सुविधा तक ही क्यों आकर ठहर गई है। क्यों हम इससे आगे सोच ही नहीं पा रहे है। संस्कार और अनुशासन की बातों को हम अवांच्छित क्यों समझने लगे है।

इस सम्बन्ध में समाज शास्त्रियों का कहना है कि हमने अपने बच्चों को सुख सुविधा की ओर मोड दिया है। अनुशासन या संस्कार में ना ही हम रहे और ना ही हमने बच्चों को रखा। यही कारण है कि आज हमारे द्वारा निर्मित समाज में हम ही असुरक्षित और भयग्रस्त है। इस पर विचार होना चाहिये और यह विचार अपने व अपने परिवार से ही शुरू होगा तभी समाज में किसी प्रकार के अच्छे बदलाव की बात हो सकेगी ।

हम सभी प्रकार की सुख सुविधाओं को भोगें तथा अपने बच्चों को भी उपलब्ध करावें लेकिन इस रूप मे कि वह सुख सुविधा पाकर विनम्र बने, संस्कारवान बने, अनुशासित रहकर समाज व देश को उन्नति के मार्ग पर ले जाय। हमारा मान सम्मान बना रहे। विधवा ब्राह्मणी के पुत्र अनुशासित और संस्कारवान थें। उसे अपने पुत्रों पर पूर्ण विष्वास था इस कारण से उसने किसी प्रकार के बाहरी धन या सुख सुविधा की आवश्यकता नहीं समझी। हमें भी इस पर विचार करना चाहिये ।

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