’’खाता’’ है, तब तक खाता है

’’खाता’’ है, तब तक खाता है

Ramswaroop Rawatsare
रामस्वरूप रावतसरे लेखक

त्रिवेणी धाम में कथा का वाचन हो रहा था। कथावाचक महाराज ने प्रसंगवष एक कहानी सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति महात्मा जी के पास आया और बोला कि ’’महाराज मेरा लडका खाता बहुत है’’। महात्मा ने कहा कि ’’खाता बहुत है! क्या मतलब है तुम्हारा ? उस व्यक्ति ने कहा ’’महाराज मेरा लडका दिन भर खाता ही रहता है।’’ महात्मा बोले ’’तुम्हारा लडका खाता बहुत है।’’ वह बोला ’’हां महाराज, इसका कोई इलाज बताओं ताकि वह कम खाये’’। महात्मा फिर बोले ’’तुम्हारा लडका खाता बहुत है।’’ वह व्यक्ति फिर बोला ’’हां महाराज।’’

महात्मा जी बोले ’’भाई जबतक उसका ’’खाता’’ है तब तक वह खायेगा ही। जब उसका खाने का ’’खाता’’ खत्म हो जावेगा। वह अपने आप खाना बन्द कर देगा’’। वह व्यक्ति बोला ’’महाराज में समझा नही’’ । महात्मा ने समझाया कि ’’तुम्हारा लडका जन्म से ही खाने का खाता लेकर आया है। जितना उसका खाता है, वह खायेगा ही। उसके बाद उसकी अत्यधिक खाने की आदत कोई ना कोई बिमारी को आमन्त्रण देगी, वह डाॅक्टरों के पास जावेगा। डाॅक्टर उसे कम खाने या नहीं खाने की सलाह देगें। गरिष्ठ भोजन के बजाय दाल का पानी, खिचड़ी, दलिया बताएंगे वह भी एक समय। तब समझों कि उसका खाने का ’’खाता’’ अब खत्म होने की ओर है। बिमारी के चलते वह अपने आप खाना बन्द या कम कर देगा, समझे!

ऐसे ही हम सब खाने का ’’खाता’’ लेकर आते है। जिसके खाते में खाने की कम मात्रा होती है वह उसे बढाने के लिये कई प्रकार के प्रयास करता है, और जिसके खाते में पहले से ही बहुत कुछ है वह उसे जल्दी से जल्दी खा पी कर निपटाने में तथा बढाने में लगा रहता है। लेकिन होता वही है जो उसके ’’खाते’’ में पहले से होता है। हां जो संयम से खाते है, वे लम्बे समय तक अपने खाते को चला ले जाते है और जो खाने में संयम नहीं रखते, उनका ’’खाता’’ जल्दी बन्द हो जाता है। खाने पीने में जिन लोगों ने संयम बरता वे आज स्वस्थ है। उनके किसी प्रकार की बिमारी नहीं है। जिन्होंने ऐसा नहीं किया वे, कई प्रकार की बिमारियों से जुझ रहे हैं। भूख में आकर्षण प्रबल होता है, पर उसका अंत बहुत ही दुखदायी होता है।

आदि शंकराचार्य के अनुसार ’’सुखेन क्रियते रामायोगः। पष्चाधन्त रीरे रोगः।।’’ अर्थात ’’मनुष्य पहले तो सुख से भोगों को भोगने का प्रयत्न करता है, परन्तु बाद में वही भोग, रोग बनकर उसी मनुष्य का पीछा करते है।’’ हमें खाना तो खाना चाहिये लेकिन कितने खाने से हमारा शरीर चल सकता है । उतना ही खाना खाने का प्रयास होना चाहिये ।

यह शरीर प्रकृति की देन बताया जाता है, जिसे हम यदि प्रकृति के नियमों के अनुसार ही रखेंगें तो इसकी उर्जा लम्बे समय तक बनी रहेगी । यह उर्जा इस बात पर ही निर्भर करती है कि हम कितने संयम से रहते है । जहां हमने वासना को प्रबल होने दिया वहां भागदौड शुरू हो जाती है । हम उसे शान्त करने के उपाय खोजने लगते है। जितना उसे शान्त करने की कोशिश होती हैं, उसकी ज्वाला उतनी ही प्रबल होती जाती है।

किसी भी प्रकार की वासना को विवेक से ही शान्त किया जा सकता है । जिस व्यक्ति का विवेक जागृत अवस्था में होगा, वहां चेतनता होगी। यहां सही गलत के साथ साथ सत्य का और सौन्दर्य का सहज प्रवाह होगा। विवेकशील व्यक्ति अंहकार से कोसों दूर होता है। वासना को आधार मानकर जीने वाला व्यक्ति अहंकारी होता है। अहंकार पतन की ओर ले जाता है। विवेक मनुष्य के शरीर में सरलता, सौम्यता तथा आशावादिता लाता है, जो आत्मा को प्रकाशमान करने में सहायक होती है। आत्मा का प्रकाशमान होना ही श्रेष्ठता के मार्ग पर चलना है। इसलिये किसी भी प्रकार की भूख को अपने पर हावी नहीं होने देने में ही हमारी भलाई है।

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