नई दिल्ली / विशेष रिपोर्ट: देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर देश की तकदीर और राजनीति की दिशा तय करता दिख रहा है। पेपर लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतरे हजारों युवाओं के प्रदर्शन ने अब एक ऐसे देशव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया है, जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
शुरुआत में अनदेखी, फिर बढ़ा जनाक्रोश
शुरुआत में इस आंदोलन को बेहद हल्के में लिया जा रहा था। युवाओं की आवाज को दबाने और जंतर-मंतर तक सीमित रखने की कोशिश की गई। लेकिन माहौल तब पूरी तरह बदल गया जब लद्दाख के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को मौके से गलत तरीके से हटाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस घटना ने युवाओं और आम जनता के गुस्से में आग में घी डालने का काम किया।
इसके बाद जब गुस्साए छात्रों और युवाओं ने ‘संसद मार्च’ का आह्वान किया, तो पुलिस बल और प्रशासन की बर्बरता की तस्वीरें सामने आईं।
लाठीचार्ज, पत्थरबाजी और बिना वर्दी वाले हमलावर
संसद की तरफ बढ़ रहे शांतिपूर्ण युवाओं पर भारी लाठीचार्ज किया गया। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों और वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस बर्बरता से छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया।
बड़ा सवाल: आंदोलन के दौरान कुछ ऐसे लोग भी दिखे जो बिना किसी वर्दी के हाथ में डंडे लेकर प्रदर्शनकारियों और आम जनता पर हमला कर रहे थे तथा पत्थरबाजी में शामिल थे। हालांकि, इस झड़प में कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं, लेकिन असली सवाल यह उठता है कि आखिर स्थिति को इस मोड़ तक क्यों पहुंचने दिया गया?
मौन टूटने का सच: ट्वीट, वीडियो और फास्ट ट्रैक का वादा
लंबे समय से कई अहम मुद्दों पर चुप्पी साधने की नीति देखी जा रही थी—चाहे राम मंदिर चढ़ावा विवाद हो या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से जुड़ा जमीन विवाद। लेकिन जंतर-मंतर पर युवाओं के भारी हुजूम और बढ़ते जन-आक्रोश को देखकर आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ी।
प्रधानमंत्री ने पहले एक्स (ट्वीट) पर पोस्ट किया और फिर देर रात एक वीडियो संदेश जारी कर यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि “पेपर लीक मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए होगी और दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जाएगी।”
लेकिन असली सवाल का क्या? धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर चुप्पी क्यों?
प्रधानमंत्री ने फास्ट ट्रैक कोर्ट और सजा की बात तो कह दी, लेकिन पूरे वीडियो और ट्वीट में उस सबसे प्रमुख मांग को गोल कर गए जो देश का युवा सड़क पर उतरकर मांग रहा था—केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा!
पेपर लीक जैसे बड़े घोटाले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए जब देश के युवा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं, तब उस पर एक शब्द भी न बोलना क्या दर्शाता है? यह साफ इशारा करता है कि सरकार जनता को सांत्वना देने और आंदोलन को शांत करने के लिए वादे तो कर रही है, लेकिन अपने मंत्रियों को बचाने की जिद्द पर अड़ी है और युवाओं की मूल मांग को सुनने के लिए तैयार नहीं है।
गोदी मीडिया की नाकामी और सरकार में दिखा डर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शायद केंद्र सरकार को यह भरोसा था कि गोदी मीडिया के जरिए जनता का ध्यान भटका दिया जाएगा। लेकिन जब सड़कों पर उतरा युवा पीछे नहीं हटा, तो खुद प्रधानमंत्री को मैदान में उतरना पड़ा।
रातों-रात वीडियो जारी करना और फास्ट ट्रैक कोर्ट का दांव चलना यह साबित करता है कि सत्ता में कहीं न कहीं इस जन-आंदोलन का खौफ बैठ चुका है। लेकिन जब तक धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और पारदर्शी कार्रवाई पर फैसला नहीं होता, तब तक युवाओं का यह गुस्सा थमने वाला नहीं है।
इतिहास गवाह है कि जब देश का युवा सड़कों पर उतरता है, तो बड़े-बड़े तख्त हिल जाते हैं। जंतर-मंतर से उठी यह चिंगारी अब पूरे देश में फैल चुकी है, और दिल्ली को यह समझना होगा कि आधी-अधूरी बातों और चुनिंदा आश्वासनों से युवाओं का आक्रोश शांत नहीं होने वाला।













